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प्यार में तागत तो है

In Uncategorized on नवम्बर 14, 2011 at 12:46 अपराह्न
 By manojjaioswalpbt{मनोज जैसवाल }

शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रेम दर्द निवारक दवा का काम करता है
प्रेम करने वाले दर्दे-दिल के गवाह हैं लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रेम दर्द का इलाज हो सकता है.

मस्तिष्क की बारीक़ी जांच से पता चलता है कि मस्तिष्क के जो हिस्से दर्द से निपटने के समय सक्रिय होते हैं वो प्रेम संबंधी विचारों के समय भी सक्रिय होते हैं. अमरीका के स्टेनफ़र्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 15 छात्रों को हल्का दर्द पहुंचाया और साथ ही ये देखा कि अपने प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर देखते हुए उनका ध्यान बंटा या नहीं. उल्लेखनीय है कि ये अध्ययन उन लोगों पर किया गया जिनके प्रणय संबंध शुरुआती दौर में थे. इसलिए हो सकता है कि प्रेम की इस दवा का असर आगे चलकर बेअसर हो जाए. प्रेम एक सशक्त भाव जिन वैज्ञानिकों ने ये प्रयोग किया उन्होने मस्तिष्क के अलग अलग हिस्सों की गतिविधियों को मापने के लिए फ़ंक्शनल मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग या एफ़एमआरआइ का इस्तेमाल किया. विज्ञान जगत में ये बात जानी जाती है कि प्रेम की सशक्त भावनाएं मस्तिष्क के कई हिस्सों में गहन गतिविधि पैदा करती हैं. इसमें मस्तिष्क के वो हिस्से भी शामिल हैं जो डोपेमाइन नामक रसायन पैदा करते हैं. इस रसायन से व्यक्ति अच्छा महसूस करता है. ये रसायन आमतौर पर मिठाई खाने के बाद या कोकेन जैसे मादक पदार्थ के सेवन के बाद पैदा होता है. स्टेनफ़र्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि जब हमें दर्द की अनुभूति होती है तो हमारे मस्तिष्क के कुछ हिस्से गतिशील हो उठते हैं. उन्होने ऐसे 15 छात्रों पर प्रयोग किया जिनका प्रणय संबंध को नौ महीने से अधिक नहीं हुए थे. इसे गहन प्रेम का पहला चरण माना जाता है.

एक उदाहरण फ़ुटबॉल खिलाड़ी का दिया जा सकता है जो गंभीर चोट लगने के बावजूद खेलता रहता है क्योंकि वो भावात्मक आवेश की स्थिति में होता है.

प्रोफ़ैसर पॉल गिल्बर्ट, स्नायुमनोवैज्ञानिक, डार्बी विश्वविद्यालय इंगलैंड

हर छात्र से अपने प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर और किसी परिचित व्यक्ति की फ़ोटो लाने को कहा गया. उन्हे ये तस्वीरें दिखाते हुए उनकी हथेली में रखे गर्मी पैदा करने वाले पैड के ज़रिए हल्का दर्द पहुंचाया गया. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उनके मस्तिष्क का स्कैन किया गया. स्कैन से पता चला कि उन्हे दर्द की अनुभूति अपने प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर देखते हुए कम हुई जबकि परिचित व्यक्ति की तस्वीर देखते हुए कुछ अधिक. शोध में शामिल डॉ जेरैड यंगर का कहना है कि प्रेम कुछ उसी तरह काम करता है जैसे दर्द निवारक दवाएं काम करती हैं. डार्बी विश्वविद्यालय के स्नायुमनोवैज्ञानिक प्रोफ़ैसर पॉल गिल्बर्ट का कहना है कि भावात्मक स्थिति और दर्द की अनुभूति के बीच ये संबंध स्पष्ट है. उन्होने कहा, “एक उदाहरण फ़ुटबॉल खिलाड़ी का दिया जा सकता है जो गंभीर चोट लगने के बावजूद खेलता रहता है क्योंकि वो भावात्मक आवेश की स्थिति में होता है”. प्रोफ़ैसर गिल्बर्ट ने कहा, “ये बात समझनी ज़रूरी है कि अकेलापन और अवसाद के शिकार लोगों में दर्द झेलने की क्षमता भी बहुत कम होती है जबकि जो लोग सुरक्षित अनुभव करते हैं और जिन्हे भरपूर प्यार मिलता है वो अधिक दर्द बर्दाश्त कर सकते हैं.

 

फिल्म समीक्षा:मर्डर 2

In Uncategorized on जुलाई 8, 2011 at 6:26 पूर्वाह्न

मनोज जैसवाल

मर्डर 2 : फिल्म समीक्षा
बैनर : विशेष फिल्म्स प्रा.लि.
निर्माता : मुकेश भट्ट
निर्देशक : मोहित सूरी
संगीत : मिथुन, हर्षित सक्सेना, संगीत और सिद्धार्थ हल्दीपुर
कलाकार : इमरान हाशमी, जैकलीन फर्नांडिस, प्रशांत नारायणन, सुलग्ना पाणिग्रही, सुधांशु पांडे, याना गुप्ता (मेहमान कलाकार)
सेंसर सर्टिफिकेट : ए * 2 घंटे 10 मिनट * 14 रील

 
मर्डर 2 को विशेष फिल्म्स की ही पिछली फिल्मों को देख कर तैयार किया गया है। फिल्म में एक सीरियल किलर है जो जवान लड़कियों की हत्या करता है। इस खलनायक का पात्र ‘संघर्ष’, ‘सड़क’ और ‘दुश्मन’ जैसी फिल्मों के खलनायकों की याद दिलाता है।
सड़क के खलनायक की तरह वह किन्नर है, संघर्ष के खलनायक की तरह अंधविश्वासी है और ‘दुश्मन’ के विलेन की तरह वह लड़कियों को क्रूर तरीके से मौत के घाट उतारता है। यही नहीं बल्कि कुछ दृश्य भी महेश भट्ट की पिछली फिल्मों की याद दिलाते हैं।
खलनायक धीरज पांडे के पात्र को फिल्म में बखूबी रंग दिया गया है, लेकिन बाकी चीजें बेरंग रह गईं। कहानी, स्क्रीनप्ले और दूसरे किरदारों को गढ़ने में जो ढिलाई बरती गई है वो साफ नजर आती है। लिहाजा ‘मर्डर 2’ एक कमजोर फिल्म के रूप में सामने आती है।
अर्जुन भागवत (इमरान हाशमी) पुलिस की नौकरी छोड चुका है और पैसों की खातिर अपराधी किस्म के लोगों के लिए काम करता है। शहर की कई कॉलगर्ल गायब हो जाती हैं। क्यों? कैसे? कौन है इसके पीछे? इसका पता करने जिम्मेदारी सौंपी जाती है अर्जुन को।
अर्जुन मालूम करता है कि इन लड़कियों के गायब होने की कड़ी एक ही सेल फोन नंबर से जुड़ी है। वह रेशमा (सुलग्ना पाणिग्रही) को इस फोन नंबर वाले ग्राहक के पास पहुँचाता है। जब रेशमा की कोई खबर नहीं मिलती है तो वह ग्लानि से भर जाता है। इसके लिए वह अपने आपको दोषी मानता है।
Murder 2
बहुत जल्दी ही अर्जुन यह जान लेता है कि धीरज पांडे (प्रशांत नारायण) ही इस सबके पीछे है। कैसे अर्जुन उसके खिलाफ सबूत जुटाता है, यह फिल्म का सार है। इस मुख्य कहानी के साइड में अर्जुन और प्रिया (जैकलीन फर्नांडिस) की प्रेम कहानी का भी ट्रेक है, जिसका उद्देश्य सिर्फ उत्तेजक दृश्य दिखाना है।
फिल्म की कहानी में जो समय दिखाया गया है वो मात्र कुछ घंटों का है। इतने कम समय में इतनी घटनाओं का घटना मुमकिन नहीं लगता। स्क्रीनप्ले में भी कई कमजोरियाँ हैं, जिसमें सबसे अहम ये है कि दर्शक कहानी के साथ जुड़ नहीं पाता।
कई ट्रेक ठूँसे हुए लगते हैं, जैसे अर्जुन की ऊपर वाले से नाराजगी। अर्जुन और प्रिया की लव स्टोरी भी बेहद बोरिंग है, जिसमें प्रिया एकतरफा प्यार करती है और अर्जुन ‍उसकी जिम्मेदारी से भागता रहता है।
रेशमा को धीरज पांडे के पास भेजकर अर्जुन का पश्चाताप करना भी उसके किरदार के प्रति दर्शकों की सहानुभूति पैदा करने के लिए रखा गया है, जो बेहद सतही है। आरोपी धीरज के खिलाफ अर्जुन का सबूत जुटाना स्क्रिप्ट का सबसे मजबूत पहलू होना था क्योंकि सारा थ्रिल और कहानी की रीढ़ यही है, लेकिन यह हिस्सा भी अस्पष्ट और सतही है। किसी भी किस्म का रोमांच महसूस नहीं होता।
निर्देशक के रूप में मोहित सूरी खास प्रभावित नहीं करते। खासतौर पर शुरुआती 45 मिनट तो बेहद बोर है। मोहित परदे पर घट रहे घटनाक्रम की कड़ियों को सफाई से नहीं जोड़ पाए। न ही वे अर्जुन और प्रिया के रोमांस की गरमाहट को ठीक से फिल्मा पाए। धीरज पांडे की क्रूरता को उन्होंने बखूबी पेश किया है।
Muder 2 Movie Review
जैकलीन फर्नांडिस बेहद हॉट और सेक्सी नजर आईं, लेकिन संवाद बोलते ही उनके अभिनय की पोल खुल जाती है। इमरान हाशमी का अभिनय औसत दर्जे का रहा। उन पर भारी पड़े प्रशांत नारायण जिन्होंने धीरज पांडे ‍का किरदार‍ निभाया है। ठंडे दिमाग वाले खलनायक का पात्र उन्होंने अच्छी तरह पेश किया है। संवाद के बजाय अपने चेहरे के भावों के जरिये उन्होंने क्रूरता दिखाई। याना गुप्ता की सेक्स अपील भी एक गाने में नजर आती है। फिल्म का गीत-संगीत, फोटोग्राफी और संपादन प्रभावशाली हैं।
कुल मिलाकर ‘मर्डर 2’ का निर्माण ‘मर्डर’ ब्रांड को भुनाने के लिए किया गया है और ‘मर्डर’ की तुलना में यह फिल्म पीछे है।
Reed More

कैसे लिखें अपनी वसीयत!

In hindi post, Uncategorized on जुलाई 6, 2011 at 10:23 पूर्वाह्न
manojjaiswalpbt 

18 वर्ष से अधिक आयु, मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों, जिनके पास संपत्ति/जीवन बीमा पॉलिसी है, को अपनी वसीयत आवश्यक रूप से लिखना चाहिए। वसीयत लिखने से व्यक्ति के जीवनकाल में संपत्ति पर उसी का अधिकार रहता है एवं मृत्यु उपरांत ही उत्तराधिकारी संपत्ति प्राप्त कर सकता है। व्यक्ति अपने जीवनकाल में वसीयत कितनी भी बार बदल सकता है एवं उसके द्वारा लिखी गई आखरी वसीयत ही मान्य होती है।

वसीयत लिखकर न सिर्फ कोई व्यक्ति अपनी इच्छानुसार संपत्ति का बँटवारा कर सकते हैं, बल्कि अपने वारिसों को पारिवारिक विवाद, कानूनी उलझनों एवं खर्चों से भी बचा सकते हैं। वसीयत से वारिसों की टैक्स प्लानिंग भी बखूबी की जा सकती है।

1. संपत्ति एवं दायित्वों की सूची: सर्वप्रथम अपनी सभी संपत्तियों एवं दायित्वों की सूची बना लेना चाहिए, जिसमें सभी चल-अचल संपत्ति, जीवन बीमा पॉलिसी, दुर्घटना बीमा पॉलिसी एवं समस्त दायित्वों का समावेश हो।

2. उत्तराधिकारियों की सूची : ऐसे व्यक्तियों/रिश्तेदारों की सूची बना लेना चाहिए, जिनके हक में आप वसीयत लिखना चाहते हैं।

3. उत्तराधिकारियों को दी जाने वाली संपत्ति का निर्धारण : आप किस व्यक्ति को कौनसी संपत्ति एवं किस अनुपात में देना चाहते हैं, का भी निर्धारण कर लेना चाहिए।

4. उत्तराधिकारियों की टैक्स प्लानिंग : जिन व्यक्तियों के हक में आप वसीयत लिखना चाहते हैं, उन सभी की वर्तमान एवं भविष्य में वसीयत से प्राप्त संपत्ति से अर्जित आय पर टैक्स का अनुमान लगाना चाहिए एवं इस प्रकार वसीयत लिखी जाना चाहिए कि उत्तराधिकारियों को भविष्य में अर्जित आय पर कम से कम टैक्स अदा करना पड़े। इसके लिए आप एस्टेट प्लानिंग में महारथ हासिल सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर की भी मदद ले सकते हैं।

5. साधारण पेपर पर भी लिखी जा सकती हैः वसीयत साधारण पेपर पर भी लिखी जा सकती है एवं इसे स्टाम्प पेपर या लीगल पेपर पर लिखना आवश्यक नहीं होता है।

6. हस्तलिखित या टाइप्ड कैसे भी लिखी जा सकती है : कानूनी रूप से वसीयत हस्तलिखित या टाइप्ड कैसे भी लिखी जा सकती है, परंतु वसीयत सहीं ढंग से पढ़ी जा सके, उसके लिए उसे टाइप करा लेना चाहिए।

7. स्पष्ट भाषा एवं शब्दों का प्रयोग : वसीयत लिखने के लिए किसी कानूनी भाषा का उपयोग नहीं करना होता है। वसीयत में स्पष्ट भाषा एवं शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए, जिससे वसीयतकर्ता का उद्देश्य स्पष्ट हो एवं भविष्य में विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।

8. संपूर्ण एवं स्पष्ट विवरण : कौनसी संपत्ति किस उत्तराधिकारी को दी जाना है एवं किस अनुपात में दी जाना है, का उल्लेख वसीयत में स्पष्ट रूप से संपत्ति एवं उत्तराधिकारी के पूर्ण विवरण के साथ लिखना चाहिए।

9. निष्पादक की नियुक्ति : संपत्ति के बँटवारे के लिए निष्पादक नियुक्त करना अनिवार्य नहीं है, परंतु यदि संपत्ति ज्यादा है एवं विवाद की स्थिति उत्पन्ना होने की संभावना है तो अपने किसी विश्वासपात्र व्यक्ति को निष्पादक नियुक्त कर देना चाहिए।

10. प्रत्येक पेज पर हस्ताक्षर : वसीयतकर्ता को वसीयत के प्रत्येक पेज पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य होता है।

11. गवाह : वसीयत में दो गवाह अनिवार्य रूप से होना चाहिए। गवाह ऐसे व्यक्तियों को बनाया जाना चाहिए, जो परिचित हों, वयस्क हों एवं जिनका वसीयत में कोई हित न हो।

12. रजिस्ट्रेशन : वसीयत को रजिस्ट्रेशन अथवा नोटरी करना आवश्यक नहीं है, परंतु भविष्य में विवाद एवं उलझनों से बचाव के लिए रजिस्ट्रेशन करा लेना चाहिए। रजिस्ट्रेशन कराने का एक फायदा यह भी है कि वसीयत गुम होने पर उसकी कॉपी प्राप्त की जा सकती है। वसीयत का रजिस्ट्रेशन सब-रजिस्ट्रार ऑफिस (जहाँ प्रापर्टी की रजिस्ट्री होती है) में होता है।

वैसे तो वसीयत आप स्वयं, वकील या सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर की मदद से बना सकते हैं, लेकिन यदि वसीयत को चुनौती देने की संभावना है या वारिसों की टैक्स प्लानिंग करना चाहते हैं तो एस्टेट प्लानिंग में महारथ हासिल सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर से सलाह जरूर लेना चाहिए।